संस्कृत–संस्कृतिज्ञान प्रतियोगिता 2026 का पुरस्कार वितरण समारोह सम्पन्न संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार एवं संस्कारयुक्त समाज के निर्माण का आह्वान

शेयर करे

संस्कृत–संस्कृतिज्ञान प्रतियोगिता 2026 का पुरस्कार वितरण समारोह सम्पन्न संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार एवं संस्कारयुक्त समाज के निर्माण का आह्वान

संपादक पुरुषोत्तम खरोला हरिद्वार)हरिद्वार, 11 अक्टूबर 2026। संस्कृत भारती, जनपद हरिद्वार के तत्वावधान में संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति एवं संस्कृतिज्ञान के प्रति विद्यार्थियों में रुचि जागृत करने के उद्देश्य से हरिद्वार के विभिन्न विद्यालयों में संस्कृत–संस्कृतिज्ञान प्रतियोगिता 2026 का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए विद्यालय स्तर पर प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सम्मानित करने के लिए आज श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हरिद्वार में पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संस्कृत भाषा के महत्त्व, भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा दैनिक जीवन में संस्कृत के अधिकाधिक प्रयोग पर विशेष बल दिया गया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण के साथ हुआ। संस्कृत भारती के कार्यकर्ता प्रकाश जोशी ने कार्यक्रम में उपस्थित समस्त गणमान्य अतिथियों, विद्वज्जनों, शिक्षकों, संस्कृत भारती के कार्यकर्ताओं एवं विद्यार्थियों का परिचय कराते हुए उनका स्वागत किया।

प्रो प्रेमचन्द्र शास्त्री ने कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन ग्रन्थों की भाषा नहीं, अपितु भारतीय ज्ञान-परम्परा, दर्शन, साहित्य, अध्यात्म एवं जीवन-मूल्यों की संवाहिका है। उन्होंने कहा कि संस्कृत सम्भाषण का अभ्यास व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संस्कृत में वार्तालाप करने से आत्मविश्वास बढ़ता है, वाणी में स्पष्टता आती है तथा विचारों को व्यवस्थित ढंग से अभिव्यक्त करने की क्षमता विकसित होती है। नियमित संस्कृत सम्भाषण से मानसिक एकाग्रता, सकारात्मकता एवं प्रसन्नता को बढ़ावा मिलता है।

संस्कृत भारती के प्रांत संघटन मंत्री श्री गौरव शास्त्री ने कहा कि संस्कृत भारती संस्कृत भाषा को जनसामान्य की भाषा बनाने के लिए निरन्तर कार्य कर रही है। संगठन का उद्देश्य संस्कृत को केवल विद्यालयों, महाविद्यालयों अथवा विद्वानों तक सीमित रखना नहीं, बल्कि प्रत्येक घर, परिवार एवं समाज तक पहुँचाना है। संस्कृत भाषा में निहित ज्ञान, विचार एवं जीवन-मूल्य व्यक्ति को संस्कारवान् बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संस्कृत के माध्यम से हम अपनी प्राचीन ज्ञान-परम्परा से जुड़ सकते हैं और भारतीय संस्कृति के मूल भावों को समझ सकते हैं। संस्कृत भारती सम्भाषण शिविरों, बालकेन्द्र, भाषा-प्रशिक्षण कार्यक्रमों, प्रतियोगिताओं एवं विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से लोगों में संस्कृत के प्रति आत्मीयता उत्पन्न करने का प्रयास कर रही है।

श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. रवीन्द्र कुमार ने अपने उद्बोधन में संस्कृत भाषा की प्राचीनता, वैज्ञानिकता, साहित्यिक समृद्धि एवं सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की ज्ञान-परम्परा की आधारभूत भाषा है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, दर्शनशास्त्र तथा आयुर्वेद सहित अनेक ज्ञान-विधाओं का विशाल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है।

समारोह का प्रमुख आकर्षण संस्कृत–संस्कृतिज्ञान प्रतियोगिता 2026 में विद्यालय स्तर पर प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का सम्मान रहा। अतिथियों एवं उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों द्वारा विजेता विद्यार्थियों को पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों के उत्साह एवं उपलब्धि की सराहना की गई।

शिवडेल स्कूल, बीएचईएल ने प्रथम, सरस्वती शिशु मंदिर इंटर कॉलेज, बीएचईएल ने द्वितीय एवं राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, ज्वालापुर ने तृतीय स्थान प्राप्त किया इसके साथ ही 2 विद्यालयों ने सांत्वना पुरस्कार भी प्राप्त किया, जिसमें हरिराम आर्य इंटर कॉलेज, मायापुर एवं ज्वालापुर इंटर कॉलेज रहा।

संस्कृत भारती के सह प्रान्त मंत्री डॉ वेदव्रत ने कहा कि संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति से सम्बन्धित प्रतियोगिताओं के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी परम्पराओं के प्रति जागरूक बनाने का अवसर प्राप्त होता है। पुरस्कार प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को बधाई देते हुए अन्य विद्यार्थियों को भी संस्कृत के अध्ययन, अभ्यास एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ. विजय त्यागी ने सभी अतिथियों, आयोजकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं संस्कृत भारती के कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा का वास्तविक प्रचार-प्रसार तभी सम्भव है, जब हम इसे अपने दैनिक व्यवहार में स्थान दें। इसके लिए किसी बड़े आयोजन अथवा विशेष अवसर की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों में भी संस्कृत के वाक्यों का प्रयोग आरम्भ किया जा सकता है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. सर्वेश एवं डॉ. शिवदेव के द्वारा किया गया। उन्होंने कार्यक्रम की विभिन्न गतिविधियों को सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाते हुए वक्ताओं के विचारों एवं पुरस्कार वितरण समारोह को प्रभावी रूप प्रदान किया।

कार्यक्रम में देशराज शर्मा, विवेक, शिवम, अंकित एवं गोपाल तथा अनेक गणमान्य विद्वज्जन उपस्थित रहे।