‘रामायण काल में संस्कृत से अलग कोई भाषा नहीं’ — श्रीश देवपूजारी कुम्भ मेला हो संस्कृत मेला’ — डॉ. गौरव शास्त्री
संपादक पुरुषोत्तम खरोला हरिद्वार/हरिद्वार संस्कृत भारती, हरिद्वार नगर द्वारा संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार को गति प्रदान करने तथा जनसामान्य में संस्कृत के प्रति रुचि जाग्रत करने के उद्देश्य से संस्कृत प्रचार-प्रसार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में संस्कृत भारती के अखिलभारतीय प्रचार प्रमुख श्रीश देवपूजारी ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए संस्कृत भाषा के महत्त्व, उसकी वर्तमान प्रासंगिकता तथा समाज के विभिन्न वर्गों तक संस्कृत को पहुँचाने के उपायों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
श्रीश देवपूजारी ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज शरद पूर्णिमा है, यह पर्व हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थ रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के जन्म का दिन है। रामायण ग्रन्थ संस्कृत में है, रामायण काल में सभी स्थानों पर संस्कृत भाषा प्रसिद्ध थी, अन्य कोई भाषा प्रयोग में नहीं थी। रामायण, महाभारत ग्रन्थों का अध्ययन केवल कथा-श्रवण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, अपितु इनके प्रसंगों को उनके मूल सन्दर्भ में समझने का प्रयास भी किया जाना चाहिए। उन्होंने रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाओं का उल्लेख करते हुए श्रोताओं का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया कि भारतीय वाङ्मय का सम्यक् अध्ययन हमारी सांस्कृतिक परम्परा को समझने तथा अपनी धरोहर के प्रति जागरूकता विकसित करने में सहायक है। संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार इन महान् ग्रन्थों के मूल स्वरूप और उनमें निहित ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुँचाने का भी एक प्रभावी माध्यम है।
उन्होंने संस्कृत प्रचार-प्रसार के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भाषा के प्रति अनुराग उत्पन्न करने के लिए लोगों को संस्कृत की सरलता, वैज्ञानिकता और अभिव्यक्ति-क्षमता से परिचित कराना आवश्यक है। विद्यार्थियों, युवाओं, शिक्षकों, अभिभावकों तथा समाज के विभिन्न वर्गों को संस्कृत से जोड़ने के लिए निरन्तर प्रयास किए जाने चाहिए। संस्कृत के सरल वाक्यों, सुभाषितों, गीतों, कथाओं और संवादों के माध्यम से लोगों में इस भाषा के प्रति सहज आकर्षण उत्पन्न किया जा सकता है। प्रत्येक कार्यकर्ता को चाहिए कि वह अपने सामर्थ्य के अनुसार संस्कृत प्रचार का कोई न कोई दायित्व स्वीकार करे और नियमित रूप से उसका निर्वहन करे।
इस अवसर पर संस्कृत भारती के प्रान्त संगठन मन्त्री गौरव शास्त्री ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए संस्कृत प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय, संगठित और निरन्तर प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया कि वे संस्कृत भाषा को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास करें और संस्कृत के प्रति जनरुचि विकसित करने में योगदान दें। आने वाले कुम्भ मेले को संस्कृतमय बनाने के लिए योजनाओं के क्रियान्वयन पर बल दिया।
गोष्ठी का संचालन संस्कृत भारती के प्रान्त सहमन्त्री डॉ. वेदव्रत ने किया। उन्होंने कार्यक्रम का संचालन करते हुए गोष्ठी के उद्देश्य तथा संस्कृत प्रचार-प्रसार के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने उपस्थित विद्वानों और कार्यकर्ताओं को गोष्ठी के विचार-विमर्श से प्रेरणा लेकर संस्कृत भाषा के संवर्धन हेतु निरन्तर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम के अन्त में प्रचार प्रमुख डॉ. शिवदेव आर्य ने सभी अतिथियों, विद्वानों एवं उपस्थित कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए भविष्य में होने वाले कार्यक्रमों की योजनाओं पर विचार—विमर्श किया।
इस संस्कृत प्रचार-प्रसार गोष्ठी में प्रेमचन्द्र शास्त्री, डॉ. अरविन्द नारायण मिश्र, डॉ. सर्वेश, डॉ. अतुल चमोला, डॉ. सुमन्त, डॉ. श्रीकृष्ण चन्द्र, सुरेन्द्र स्वरूप, शिवम्, महिमा आदि सहित अनेक विद्वान एवं संस्कृत अनुरागी उपस्थित रहे।


