आस्था और अलौकिकता का दिव्य संगम: कोटद्वार का पावन सिद्धबली हनुमान दरबार

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आस्था और अलौकिकता का दिव्य संगम: कोटद्वार का पावन सिद्धबली हनुमान दरबार

गुरु गोरखनाथ के विशेष आग्रह पर यहाँ साक्षात प्रहरी के रूप में वास करते हैं संकटमोचन

इसी तपोभूमि पर परम सिद्ध गुरु गोरखनाथ को प्राप्त हुई थीं अनेकानेक अलौकिक सिद्धियां

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कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल)।

संपादक पुरुषोत्तम खरोला हरिद्वार उत्तराखंड के प्रवेश द्वार कोटद्वार नगर से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर, कल-कल निनाद करती पुण्यतोया खोह नदी के तट पर स्थित भगवान सिद्धबली का पावन दरबार श्रद्धा, भक्ति और प्रकृति का एक अलौकिक संगम है। एक छोटी सी सुरम्य पहाड़ी पर विराजमान भगवान हनुमान को समर्पित इस प्राचीन मंदिर का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है। मंदिर के पृष्ठ भाग में फैली हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं भक्तों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं और आत्मिक शांति का भान कराती हैं।

गुरु गोरखनाथ और हनुमान जी का अद्भुत प्रसंग

इस सिद्ध पीठ के उद्गम से जुड़ी पौराणिक कथाएं अत्यंत रोचक हैं। मान्यता है कि इस पवित्र स्थल पर श्री राम भक्त हनुमान, नाथ संप्रदाय के महान संत गुरु गोरखनाथ के विशेष आग्रह पर हर पल एक सजग प्रहरी के रूप में वास करते हैं।

पौराणिक प्रसंगों के अनुसार, एक बार गुरु गोरखनाथ अपने गुरु मत्स्येंद्रनाथ के कल्याणार्थ भ्रमण करते हुए इस वन क्षेत्र से गुजर रहे थे। तभी भगवान हनुमान ने वे श बदलकर उनका मार्ग रोक लिया। इस पर शिव अवतार माने जाने वाले परम सिद्ध गुरु गोरखनाथ और रुद्रावतार हनुमान जी के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें दोनों ही अजेय रहे। अंततः हनुमान जी अपने वास्तविक और विराट स्वरूप में प्रकट हुए। गुरु गोरखनाथ ने उन्हें आदरपूर्वक नमन किया। तब हनुमान जी ने पूछा कि उनके लिए क्या आदेश है? इस पर गुरु गोरखनाथ ने विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि वे इस महान सिद्ध भूमि पर प्रहरी के रूप में वास करें और जनमानस का कल्याण करें। संकटमोचन ने यह आग्रह सहर्ष स्वीकार कर लिया। तभी से इस पावन तपोस्थली का नाम ‘सिद्धबली

’ पड़ा।