भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में हुआ संस्कृत सप्ताह के पञ्चम दिवस का आयोजन
संपादक पुरुषोत्तम खरोला हरिद्वार ) हरिद्वार श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में चल रहे सात दिवसीय ‘संस्कृत सप्ताह महोत्सव’ के पञ्चम दिवस का भव्य, गरिमामय एवं शोधपरक आयोजन महाविद्यालय के मुख्य सभागार में सम्पन्न हुआ। महोत्सव के पञ्चम दिवस का मुख्य केंद्र बिंदु “संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता, संरचनात्मक सुदृढ़ता एवं आधुनिक युग में इसकी उपादेयता” रहा। इस विशेष सत्र में मुख्य वक्ता, समन्वयक एवं संयोजक ने आधुनिक भाषा-विज्ञान के सन्दर्भ में संस्कृत भाषा के वैश्विक सामर्थ्य पर विस्तारपूर्वक अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का औपचारिक शुभारम्भ मुख्य वक्ता डॉ. सचिन द्विवेदी, समन्वयक डॉ. रवीन्द्र कुमार तथा संयोजक डॉ. अंकुर कुमार आर्य द्वारा वेदमन्त्रों के उच्चारण के साथ हुआ। तत्पश्चात् महाविद्यालय के छात्रों ने मङ्गलाचरण एवं स्वस्तिवाचन का मधुर पाठ किया।
कार्यक्रम संयोजक डॉ. अंकुर कुमार आर्य ने सभी का औपचारिक स्वागत किया और कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि संस्कृत सप्ताह के इस पञ्चम दिवस का उद्देश्य युवाओं में संस्कृत भाषा के प्रति आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. सचिन द्विवेदी ने संस्कृत भाषा का वैज्ञानिक स्वरूप एवं वैश्विक प्रासङ्गिकता पर अपना अत्यंत विद्वतापूर्ण एवं शोधपरक संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि महर्षि पाणिनि का ‘अष्टाध्यायी’ केवल व्याकरण का ग्रंथ नहीं है, बल्कि पाणिनीय सूत्रों के माध्यम से शब्दों की व्युत्पत्ति पूरी तरह गणितीय और नियमबद्ध होती है। उन्होंने बताया कि संस्कृत एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें वाक्य में शब्दों का क्रम बदलने पर भी उसका अर्थ नहीं बदलता। यह विशेषता इसे सुपरकंप्यूटिंग और एआई एल्गोरिदम के लिए सर्वश्रेष्ठ बनाती है।
कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. रवीन्द्र कुमार ने संस्कृत भाषा के उच्चारण शास्त्र और ध्वनि-विज्ञान की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत का प्रत्येक वर्ण और मात्रा वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। संस्कृत वर्णमाला का वर्गीकरण मुख के उच्चारण स्थानों के पूर्णतः अनुकूल है। संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करने से तंत्रिका तंत्र सक्रिय होता है, जिससे मानसिक स्पष्टता और स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है। गणित (शून्य और दशमलव प्रणाली), खगोल विज्ञान, आयुर्वेद तथा भौतिकी की मूल अवधारणाएँ संस्कृत पांडुलिपियों में ही संरक्षित हैं। आपने कहा कि संस्कृत केवल श्रद्धा की भाषा नहीं है, यह शुद्ध विज्ञान और तर्क की भाषा है। ऋषियों ने जिस भाषा की रचना की, वह आज के आधुनिक विज्ञान की कसौटियों पर भी पूरी तरह खरी उतरती है।
सत्र के संयोजक डॉ. अंकुर कुमार आर्य ने पूरे कार्यक्रम का कुशल संयोजन करते हुए मुख्य वक्ता डॉ. सचिन द्विवेदी एवं समन्वयक डॉ. रवीन्द्र कुमार के विचारों का समाकलन किया। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय निरंतर ऐसे बौद्धिक कार्यक्रमों के माध्यम से संस्कृत भाषा की वैज्ञानिक पहचान को स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहेगा।
इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। श्रोताओं ने मुख्य वक्ता और समन्वयक के विचारों को अत्यंत ध्यानपूर्वक सुना तथा प्रश्नोत्तरी सत्र में अपनी जिज्ञासाएँ शांत कीं। राष्ट्रगीत तथा राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।


